अलवऱ राजस्थान

अलवर जिला राजस्थान के समृद्ध विरासत का जिला है, यह जिला अब देश के राष्ट्रिय राजधानी क्षेत्र में आ गया है, यह पहले अहीरवाल क्षेत्र का भाग था और यह ऑलिव यानि की जैतून की खेती के लिए प्रसिद्द है। [Know about Bhangarh Fort]

अलवर जिले का क्षेत्रफल ८३८० वर्ग किलोमीटर है और २०११ की जनगणना के अनुसार अलवर की जनसँख्या ३६७१९९९ और जनसँख्या घनत्व ४३८ व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है, अलवर की साक्षरता ७२% महिला पुरुष अनुपात ८९४ महिलाये प्रति १००० पुरुषो पर है और २००१ से २०११ के बीच जनसँख्या विकास दर २२.७% रही है। [Know About Ajabgarh Fort]

अलवर भारत में कहाँ पर है

अलवर जिला राजस्थान के उत्तर पूर्वी भाग में है, अलवर के अक्षांस और देशांतर क्रमशः २७ डिग्री ३४ मिनट उत्तर से ७६ डिग्री ३६ मिनट पूर्व तक है, अलवर की समुद्रतल से ऊंचाई २६८ मीटर है और अलवर दिल्ली से १६० किलोमीटर दक्षिण में है और राजस्थान की राजधानी जयपुर अलवर से १५० किलोमीटर उत्तर में है।

अलवर के पडोसी जिले

अलवर के उत्तर में हरियाणा का रेवाड़ी जिला है, उत्तर पूर्व में मेवात और उत्तर पश्चिम में भी हरियाणा का महेंद्रगढ़ जिला है, दक्षिण पूर्व में भरतपुर जिला, दक्षिण में दौसा और उत्तर में जयपुर जिला है।

Information about Alwar in Hindi

नाम अलवर
राज्य राजस्थान
क्षेत्र 8,380 किमी²
अलवर की जनसंख्या 315,310
अक्षांश और देशांतर 27.5530 डिग्री नं, 76,6346 डिग्री ई
अलवर का एसटीडी कोड 144
अलवर की पिन कोड 3010 01
जिला मजिस्ट्रेट (डीएम कलेक्टर) श। मुक्तांद
पुलिस अधीक्षक (एसपी / एसएसपी) राहुल प्रकाश
मुख्य विकास अधिकारी श। ऋषिराज सिंघल
मुख्य चिकित्सा अधिकारी श। मुक्तांद अग्रवाल (आईएएस)
संसद के सदस्य महंत चांद नाथ
विधायक जयराम जाटव, भाजपा
उपखंडों की संख्या ना
तहसील की संख्या 16
गांवों की संख्या 2072
रेलवे स्टेशन अलवर जंक्शन
बस स्टेशन अलवर में बस सेवा
अलवर में एयर पोर्ट अलवर में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा
अलवर में होटल की संख्या 150
डिग्री कॉलेजों की संख्या 138
अंतर कॉलेजों की संख्या 130
मेडिकल कॉलेजों की संख्या 3
इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या 29
अलवर में कंप्यूटर केंद्र 245
अल्लावार में मॉल 2
अलवर में अस्पताल 125
अलवर में मैरेज हॉल 50
नदी (ओं) अरवरी नदी
उच्च मार्ग राजमार्ग संख्या 13
ऊंचाई 268 मीटर
घनत्व 438 व्यक्ति / वर्ग किलोमीटर
आधिकारिक वेबसाइट Http://alwar.rajasthan.gov.in/content/raj/alwar/en/home.html#
साक्षरता दर 83.75 प्रतिशत
बैंक इलाहाबाद बैंक, केंद्रीय सहकारी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक अलवर, एक्सिस बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, आईडीबीआई बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, यूको बैंक, इंडसइंड बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, ओरिएंटल बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, ओबीसी बैंक , बंधन बैंक, पीएनबी बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, एचडीएफसी लिमिटेड, एसबीआई ब्रांच, एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, आईसीआईसीआई बैंक
प्रसिद्ध नेता (ओं) जय सिंह
राजनीतिक दलों बीजेएस, सीपीआई, कांग्रेस, सपा, भाजपा
आरटीओ कोड आरजे -2
आधार कार्ड केंद्र 15
स्थानीय परिवहन कार, ​​ट्रेन, बस और टैक्सी
मीडिया समाचार पत्र, ग्रामीण / शहरी होने के रेडियो, ट्रांजिस्टर, मीडिया, टेलीविजन
विकास 22.70%
यात्रा स्थलों भांगगढ़ किला, बाला किला, सिटी पैलेस, अजबगढ़ किला, मोती दोओगरी, विजय मंदिर पैलेस, क्लॉक टॉवर, भर्तारीहरि मंदिर, कंपनी बाग, कृष्ण मंदिर, जय पोल फोर्ट, विनय विलास पैलेस

अलवऱ का नक्शा मानचित्र मैप

गूगल मैप द्वारा निर्मित अलवऱ का मानचित्र, इस नक़्शे में अलवऱ के महत्वपूर्ण स्थानों को दिखाया गया है

अलवऱ जिले में कितनी तहसील है

अलवर जिले में १२ तहसीलें है, जिनके नाम १. अलवर 2. बंसूर 3. बेहरोर 4. काथुमार 5. किशनगढ़ बास 6. कोटकासिम 7. लचामगढ़ 8. मंदवर 9. राजगढ़ 10. रामगढ़ 11. थानागाजी और 12. तिजारा है, इन १२ तहसीलों में किशनगढ़ बास सबसे छोटी तहसील है और राजगढ़ सबसे बड़ी तहसील है।

अलवऱ जिले में विधान सभा की सीटें

अलवर जिले में १० विधान सभा क्षेत्र है, इन विधानसभा सीटों के नाम 1. किशनगढ़ बॉस, 2. मुंडावर, ३. बेहरोर, ४. बानसूर,५. थानागाजी,६. अलवर रूरल, 7. अलवर अर्बन, ८. रामगढ, ९. राजगढ़ (ST), और १०. कठूमर (SC)

अलवऱ जिले में कितने गांव है

अलवर जिले में २०४९ गांव है जो की जिले की १२ तहसीलों में विभाजित है, जिनकी संख्या तहसीलों के नाम के साथ इस प्रकार से है १. अलवर में २०२ गांव है, 2. बंसूर तहसील में १४७ गांव है, 3. बेहरोर में १७९ गांव है 4. काथुमार तहसील में १५३ गांव है, 5. किशनगढ़ बास में ११२ गांव है 6. कोटकासिम तहसील में ११६ गांव है, 7. लचामगढ़ में २०५ गांव है 8. मंदवर तहसील में १४६ गांव है, 9. राजगढ़ में २४८ गांव है, 10. रामगढ़ तहसील में १७७ गांव है, 11. थानागाजी में १७५ गांव है, और 12. तिजारा तहसील में १८९ गांव है।

History of Alwar in Hindi

अलवर का इतिहास – अलवर भारत के राजस्थान का एक शहर है। राजस्थान की राजधानी जयपुर से करीब १६० कि॰मी॰ की दूरी पर है। अलवर अरावली की पहाडियों के मध्य में बसा है। अलवर का पुराना नाम ‘शाल्वपुर’ था। 1775 में इसे अलवर रजवाड़े की राजधानी बनाया गया था।अलवर एक ऐतिहासिक नगर है और इस क्षेत्र का इतिहास महाभारत से भी अधिक पुराना है। लेकिन महाभारत काल से इसका क्रमिक इतिहास प्राप्त होता है। महाभारत युद्ध से पूर्व यहाँ राजा विराट के पिता वेणु ने मत्स्यपुरी नामक नगर बसा कर उसे अपनी राजधानी बनाया था। राजा विराट ने अपनी पिता की मृत्यु हो जाने के बाद मत्स्यपुरी से ३५ मील पश्चिम में विराट (अब बैराठ) नामक नगर बसाकर इस प्रदेश की राजधानी बनाया। इसी विराट नगरी से लगभग ३० मील पूर्व की ओर स्थित पर्वतमालाओं के मध्य सरिस्का में पाण्डवों ने अज्ञातवास के समय निवास किया था। तीसरी शताब्दी के आसपास यहाँ गुर्जर प्रतिहार वंशीय क्षत्रियों का अधिकार हो गया। इसी क्षेत्र में राजा बाधराज ने मत्स्यपुरी से ३ मील पश्चिम में एक नगर तथा एक गढ़ बनवाया। वर्तमान राजगढ़ दुर्ग के पूर्व की ओर इस पुराने नगर के चिन्ह अब भी दृष्टिगत होते हैं। इसी की राजधानी मोरनगरी थी जो उस समय साबी नदी के किनारे बहुत दूर तक बसी हुई थी। इस बस्ती के प्राचीन चिन्ह नदी के कटाव पर अब भी पाए जाते हैं। छठी शताब्दी में इस प्रदेश के उत्तरी भाग पर भाटी क्षत्रियों का अधिकार था। राजौरगढ़ के शिलालेख से पता चलता है कि सन् ९५९ में इस प्रदेश पर गुर्जर प्रतिहार वंशीय सावर के पुत्र मथनदेव का अधिकार था, जो कन्नौज के भट्टारक राजा परमेश्वर क्षितिपाल देव के द्वितीय पुत्र श्री विजयपाल देव का सामन्त था। इसकी राजधानी राजपुर थी। १३वीं शताब्दी से पूर्व अजमेर के राजा बीसलदेव चौहान ने राजा महेश के वंशज मंगल को हराकर यह प्रदेश निकुम्भों से छीन कर अपने वंशज के अधिकार में दे दिया। पृथ्वीराज चौहान और मंगल ने ब्यावर के राजपूतों की लड़कियों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया। सन् १२०५ में कुतुबुद्दीन ऐबक ने चौहानों से यह देश छीन कर पुन: निकुम्बों को दे दिया। १ जून १७४० रविवार को मौहब्बत सिंह की रानी बख्त कुँवर ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम प्रताप सिंह रखा गया। इसके पश्चात् सन् १७५६ में मौहब्बत सिंह बखाड़े के युद्ध में जयपुर राज्य की ओर से लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। राजगढ़ में उसकी विशाल छतरी बनी हुई है। मौहब्बत सिंह की मृत्यु के बाद उसके पुत्र प्रतापसिंह ने १७७५ ई. को अलवर राज्य की स्थापना की।

 

अलवर के पर्यटन स्थल

पूरे अलवर को एक दिन में देखा जा सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं, कि अलवर में देखने लायक ज्यादा कुछ नहीं है। अलवर ऐतिहासिक इमारतों से भरा पडा है। यहा  कि इन इमारतों के उत्थान के लिए सरकार कुछ नहीं कर रही है। इसका जीता जागता उदाहरण है शहर की सिटी पैलेस इमारत। इस पूरी इमारत पर सरकारी दफ्तरों का कब्‍जा है, कहने मात्र के लिए इसके एक तल पर संग्राहलय बना दिया गया है, विजय मंदिर पैलेस पर अधिकार को लेकर कानूनी लडाई चल रही है। इसी झगडे के कारण यह बंद पडा है, बाला किला पुलिस के अधिकार में है। फतहगंज के मकबरे की स्थिति और भी खराब है, सब कुछ गार्डो के हाथों में है, वे चाहें तो आपको घूमने दें, या मना कर दें। घूमने के लिहाज से अलवर की स्थिति बहुत सुविधाजनक नहीं, पर अलवर का सौन्दर्य पर्यटकों को बार-बार यहां आने के लिए प्रेरित करता है।

फतहगंज गुम्बद

फतहगंज का मकबरा पाँच मंजिला है और दिल्ली में स्थित अपनी समकालीन सभी इमारतों में सबसे उच्च कोटि का है। खूबसूरती के मामले में यह हूमाँयु के मकबरे से भी सुन्दर है। यह मकबरा एक बगीचे के बीच में स्थित है और इसमें एक स्कूल भी है। यह प्राय ९ बजे से पहले भी खुल जाता है। इसे देखने के बाद रिक्शा से मोती डुंगरी जा सकते हैं। मोती डुंगरी का निर्माण १८८२ में हुआ था। यह १९२८ तक अलवर के शाही परिवारों का आवास रहा। महाराजा जयसिंह ने इसे तुड़वाकर यहां इससे भी खूबसूरत इमारत बनवाने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने यूरोप से विशेष सामान मंगाया था, लेकिन दुर्भाग्यवश जिस जहाज में सामान आ रहा था, वह डूब गया। जहाज डूबने पर महाराज जयसिंह ने इस इमारत को बनवाने का इरादा छोड़ दिया। इमारत न बनने से यह फायदा हुआ कि पर्यटक इस पहाड़ी पर बेरोक-टोक चढ़ सकते हैं और शहर के सुन्दर दुश्य का आनंद ले सकते हैं।

पुर्जन विहार

यह एक खूबसूरत बाग है, जिसके बीच में एक बडा हरित हाऊस है जिसे शिमला कहा जाता है। महाराज शियोधन सिंह ने १८६८ में इस बगीचे को बनवाया और महाराज मंगल सिंह ने १८८५ में शिमला का निर्माण कराया। इस बगीचे में अनेक छायादार मार्ग हैं और कई फव्वारे लगे हुए हैं। कम्पनी बाग साल के बारह मास खुला रहता है। शिमला में घूमने का समय सुबह 9 से शाम 5 बजे तक है। कम्पनी बाग देखने के बाद आप चर्च रोड की तरफ जा सकते हैं। यहां सेंट एन्ड्रयू चर्च है लेकिन यह अक्सर बंद रहता है। इस रोड के अंतिम छोर पर होप सर्कल है, यह शहर का सबसे व्यस्त स्थान है और यहां अक्सर ट्रैफिक जाम रहता है। इसके पास ही बहुत सारी दुकानें हैं और बीच में ऊपर एक शिव मंदिर है। होप सर्कल से सात सड़के विभिन्न स्थलों तक जाती है। एक घंटाघर तक जाती है जहाँ पर कलाकंद बाजार भी है। एक सड़क त्रिपोलिया गेट से सिटी पैलेस कॉम्पलेक्स तक जाती है। त्रिपोलिया में कई छोटे-मोटे मंदिर हैं। सिटी पैलेस की तरफ जाते हुए रास्ते में सर्राफा बाजार और बजाजा बाजार पडते हैं। यह दोनों बाजार अपने सोने के आभूषणों के लिए प्रसिद्ध है।

सिटी पैलेस

सिटी पैलेस एक खूबसूरत परिसर है: गेट के पीछे एक मैदान में कृष्ण मंदिर हैं। इसके बिल्कुल पीछे मूसी रानी की छतरी और अन्य दर्शनीय स्थल हैं। इस महल का निर्माण १७९३ में राजा बख्तावर सिंह ने कराया था। पर्यटक इसकी खूबसूरती की तारीफ किए बिना नहीं रह पाते। पूरी इमारत में जिलाधीश और पुलिस सुपरिटेण्डेन्ट आदि के सरकारी दफ्तरों का कब्‍जा है। वैसे इस इमारत के सबसे ऊपरी तल पर तीन हॉल्स में विभक्त संग्रहालय भी है जिसे देखने का समय सुबह १० बजे से शाम ५ बजे तक है, पहले हॉल में शाही परिधान और मिट्टी के खिलौने रखे हैं, दूसरे हॉल में मध्य एशिया के अनेक जाने-माने राजाओं के चित्र लगे हुए हैं। इस हॉल में तैमूर से लेकर औरंगजेब तक के चित्र लगे हुए हैं। तीसरे हॉल में आयुद्ध सामग्री प्रदर्शित है। इस हॉल का मुख्य आकर्षण अकबर और जहांगीर की तलवारें हैं। इसी संग्रहालय की ‘एक मियान में दो तलवार’ यहाँ का विशेष आकर्षण है। सिटी पैलेस के बिल्कुल पीछे एक छोटा खूबसूरत जलाशय है, जिसे सागर कहते हैं। इसके चारों तरफ दो मंजिला खेमों का निर्माण किया गया है। तालाब के पानी तक सीढियाँ बनी हैं। इस जलाशय का प्रयोग स्नान के लिए किया जाता था। यहां कबूतरों को दाना खिलाने की परंपरा है। जलाशय के साथ मंदिरों की एक श्रृंखला भी है। दायीं तरफ राजा बख्तावर सिंह का स्मारक और शहीदों की याद में बना संगमरमर का स्मारक भी है। इसका नाम राजा बख्तावर सिंह की पत्नी मूसी रानी के नाम पर रखा गया है, जो राजा बख्तावर सिंह की चिता के साथ सती हो गई थी।

विजय मंदिर झील महल

यह खूबसूरत महल १९१८ में बनाया गया था। यह महाराजा जयसिंह का आवास था। इसके अंदर एक राम मंदिर भी है। सामने से पूरी तरह दिखाई नहीं देता लेकिन इसके पीछे वाली झील से इस महल का मनोरम दृश्य देखा जा सकता है।

बाला किला, अलवर

सिटी पैलैस परिसर अलवर के पूर्वी छोर की शान है। इसके ऊपर अरावली की पहाड़ियाँ हैं, जिन पर बाला किला बना है। बाला किले की दीवार पूरी पहाडी पर फैली हुई है जो हरे-भरे मैदानों से गुजरती है। पूरे अलवर शहर में यह सबसे पुरानी इमारत है, जो लगभग ९२८ ई० में निकुम्भ राजपूतों द्वारा बनाई गई थी। अब इस किले में देख नहीं सकते, क्योंकि इसमे पुलिस का वायरलैस केन्द्र है। अलवर अन्‍तर्राज्‍यीय बस अड्डे से यहां तक अच्छा सड़क मार्ग है। दोनों तरफ छायादार पेड़ लगे हैं। रास्ते में पत्थरों की दीवारें दिखाई देती हैं, जो बहुत ही सुन्दर हैं। कर्णी माता का मंदिर इसी के रास्ते मे है और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यह मंगलवार और शनिवार की रात को ९ बजे तक खुला रहता है।

जय समन्द झील

शहर के सबसे करीब जय समन्द झील है। इसका निर्माण अलवर के महाराज जय सिंह ने १९१० में पिकनिक के लिए करवाया था। उन्होंने इस झील के बीच में एक टापू का निर्माण भी कराया था। झील के साथ वाले रोड पर केन से बने हुए घर बडा ही मनोरम दृश्य प्रस्तुत करते हैं।

सिलीसेढ झील

सिलीसेड झील अलवर की सबसे प्रसिद्ध और सुन्दर झील है। इसका निर्माण महाराव राजा विनय सिंह ने १८४५ में करवाया था। इस झील से रूपारल नदी की सहायक नदी निकलती है। मानसून में इस झील का क्षेत्रफल बढकर १०.५ वर्ग किमी हो जाता है। झील के चारों ओर हरी-भरी पहाडियां और आसमान में सफेद बादल मनोरम दृश्य प्रस्तुत करते हैं।

 


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