भगवान् श्रीकृष्ण के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां

भगवान श्री कृष्ण का चरित्र जितना मोहक है उतना ही रहस्यमय है, जितना चंचल है उतना ही गंभीर, जितना सरल है उतना ही जटिल है, मानो प्रकृति का हर रूप अपने व्यतीक्रम के साथ उनके व्यक्तित्व में समाहित है।

इतने आयामों को अपने में समेटे है कि युगों-युगों से लेखनी उनके महत्व का वर्णन करना चाहती है, किंतु हर बार नित नूतन आयाम के सम्मुख आने पर नेति-नेति कह नत मस्तक हो जाती है।

भगवान श्री कृष्ण के विभिन्न नाम
भगवान् “श्री कृष्ण “को अलग अलग स्थानों में अलग अलग नामो से जाना जाता है।

उत्तर प्रदेश में कृष्ण या गोपाल गोविन्द इत्यादि नामो से जानते है।

राजस्थान में श्रीनाथजी या ठाकुरजी के नाम से जानते है।

महाराष्ट्र में बिट्ठल के नाम से भगवान् जाने जाते है।

उड़ीसा में जगन्नाथ के नाम से जाने जाते है।

बंगाल में गोपालजी के नाम से जाने जाते है।

दक्षिण भारत में वेंकटेश या गोविंदा के नाम से जाने जाते है।

गुजरात में द्वारिकाधीश के नाम से जाने जाते है।

असम ,त्रिपुरा,नेपाल इत्यादि पूर्वोत्तर क्षेत्रो में कृष्ण नाम से ही पूजा होती है।

मलेशिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंग्लैंड, फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है।

गोविन्द या गोपाल में “गो” शब्द का अर्थ गाय एवं इन्द्रियों , दोनों से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद में गो का अर्थ होता है मनुष्य की इंद्रिया…जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश में इंद्रिया हो वही गोविंद है गोपाल है।

भगवान श्री कृष्ण का संक्षिप्त जीवन परिचय
श्री कृष्ण के पिता का नाम वसुदेव था इसलिए इन्हें आजीवन “वासुदेव” के नाम से जाना गया। श्री कृष्ण के दादा का नाम शूरसेन था..

श्री कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के राजा कंस की जेल में हुआ था।

श्री कृष्ण के भाई बलराम थे लेकिन उद्धव और अंगिरस उनके चचेरे भाई थे, अंगिरस ने बाद में तपस्या की थी और जैन धर्म के तीर्थंकर नेमिनाथ के नाम से विख्यात हुए थे।

श्री कृष्ण ने 16000 राजकुमारियों को असम के राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था और उन राजकुमारियों को आत्महत्या से रोकने के लिए मजबूरी में उनके सम्मान हेतु उनसे विवाह किया था। क्योंकि उस युग में हरण की हुयी स्त्री अछूत समझी जाती थी और समाज उन स्त्रियों को अपनाता नहीं था।

श्री कृष्ण की मूल पटरानी एक ही थी जिनका नाम रुक्मणी था जो महाराष्ट्र के विदर्भ राज्य के राजा रुक्मी की बहन थी।। रुक्मी शिशुपाल का मित्र था और श्री कृष्ण का शत्रु ।

दुर्योधन श्री कृष्ण का समधी था और उसकी बेटी लक्ष्मणा का विवाह श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ हुआ था।

श्री कृष्ण के धनुष का नाम सारंग था। शंख का नाम पाञ्चजन्य था। चक्र का नाम सुदर्शन था। उनकी प्रेमिका का नाम राधारानी था जो बरसाना के सरपंच वृषभानु की बेटी थी। श्री कृष्ण राधारानी से निष्काम और निश्वार्थ प्रेम करते थे। राधारानी श्री कृष्ण से उम्र में बहुत बड़ी थी। लगभग 6 साल से भी ज्यादा का अंतर था। श्री कृष्ण ने 14 वर्ष की उम्र में वृंदावन छोड़ दिया था।। और उसके बाद वो राधा से कभी नहीं मिले।

श्री कृष्ण विद्या अर्जित करने हेतु मथुरा से उज्जैन मध्य प्रदेश आये थे। और यहाँ उन्होंने उच्च कोटि के ब्राह्मण महर्षि सान्दीपनि से अलौकिक विद्याओ का ज्ञान अर्जित किया था।

श्री कृष्ण की कुल 125 वर्ष धरती पर रहे । उनके शरीर का रंग गहरा काला था और उनके शरीर से 24 घंटे पवित्र अष्टगंध महकता था। उनके वस्त्र रेशम के पीले रंग के होते थे और मस्तक पर मोरमुकुट शोभा देता था। उनके सारथि का नाम दारुक था और उनके रथ में चार घोड़े जुते होते थे। उनकी दोनो आँखों में प्रचंड सम्मोहन था।

श्री कृष्ण के कुलगुरु महर्षि शांडिल्य थे।

श्री कृष्ण का नामकरण महर्षि गर्ग ने किया था।

श्री कृष्ण के बड़े पोते का नाम अनिरुद्ध था जिसके लिए श्री कृष्ण ने बाणासुर और भगवान् शिव से युद्ध करके उन्हें पराजित किया था।

श्री कृष्ण ने गुजरात के समुद्र के बीचो बीच द्वारिका नाम की राजधानी बसाई थी। द्वारिका पूरी सोने की थी और उसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया था।

श्री कृष्ण को ज़रा नाम के शिकारी का बाण उनके पैर के अंगूठे मे लगा वो शिकारी पूर्व जन्म का बाली था,बाण लगने के पश्चात भगवान स्वलोक धाम को गमन कर गए।

श्री कृष्ण ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अर्जुन को पवित्र गीता का ज्ञान रविवार शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मात्र 45 मिनट में दे दिया था।

श्री कृष्ण ने सिर्फ एक बार बाल्यावस्था में नदी में नग्न स्नान कर रही स्त्रियों के वस्त्र चुराए थे और उन्हें अगली बार यु खुले में नग्न स्नान न करने की नसीहत दी थी।

श्री कृष्ण के अनुसार गौ हत्या करने वाला असुर है और उसको जीने का कोई अधिकार नहीं।

भगवान श्री कृष्ण के विभिन्न कार्यों का तार्किक विश्लेषण

जन्माष्टमी पर्व कितने सारे विचार एक साथ ले कर आता है, एक तरफ यह हमें श्री कृष्ण की मनोहारी लीलाओं का संस्मरण करवाता है तो दूसरी तरफ उन लीलाओं के गूढ़ अर्थ को समझने को ललचाता भी है।

जन्माष्टमी का पर्व श्री कृष्ण के लोकनायक, संघर्ष, शील, पुरुषार्थी, कर्मयोगी व युगांधर होने के महत्व को प्रतिपादित करता है।

भगवान श्री विष्णु का सोलह कला युक्त श्री कृष्ण का अवतार सचमुच ही अद्भुत, सीमारहित, व्याख्या से परे है।

श्री कृष्ण की विराटता अनंतता और सर्व कालिक प्रासंगिकता ही श्री कृष्ण तत्व के प्रति असीमित आकर्षण का कारण है।

श्री कृष्ण हर रूप में अद्भुत हैं, ब्रज वृंदावन के कान्हा हो, मुरलीमनोहर, माखन चोर, गोपाल राधेकृष्ण, नन्द नंदन, यशोदा के लाल, रास रचैया, गोपी कृष्ण हो या देवकी नंदन, द्रौपदी के सखा, पांडवों के तारणहार वासुदेव, द्वारका के द्वारकाधीश हो।

श्री कृष्ण राधा, मीरा, गोपियों का विरह हैं और उनकी आराधना भी, वे सूरदास की दृष्टि हैं तो रसखान का अमृत भी, किंतु अपने हर रूप में पूर्ण और अनंत।

श्री कृष्ण जैसा कोई पुत्र नहीं, उन सा कोई प्रेमी नहीं, कोई सखा नहीं, कोई भाई नहीं, कोई योद्धा नहीं, कोई दार्शनिक नहीं, कोई कूटनीतिज्ञ नहीं, वे हर रूप में चमत्कार करते हैं।

“अनेक रूप रूपाय विष्णवे प्रभु विष्णवे” वे अतिमानवीय हैं, दैवीय हैं किंतु फिर भी सर्वसुलभ है।

अपने भक्त की एक आर्त पुकार पर नंगे पैर दौड़े चले आने वाले कृष्ण के कौन से रूप की व्याख्या की जाए और क्या सचमुच व्याख्या संभव है, यह जटिल प्रश्न है।

कृष्ण भारत की प्रज्ञा हैं, मेधा हैं, उनका संपूर्ण जीवन ही एक पाठशाला है।
वे ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्ति योग का उद्गम हैं, वे पुरुषार्थ का, प्रेम का अनंत सागर हैं जिसमें गोते लगाने वाले को कौन-सा अद्भुद कोष हाथ लगता है, यह गोते लगाने वाला ही जानता है।


भगवान श्री कृष्ण सच में जगदगुरु ही हैं।

कृष्ण के जन्म से उनकी लीला संवरण तक हर घटना अपने आप में गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों को समेटे हुए है, जो हमें भी यह विश्वास दिलाती है कि हर घटना एक दूजे से जुड़ी है और निर्धारित क्रम में उसका होना पूर्व निर्धारित है।

कृष्ण जन्म के समय बेड़ियों का टूटना ईश्वरीय अनुग्रह के पश्चात हर जीवात्मा का, हर बंधन से मुक्त होना दर्शाता है, यहां कृष्ण परम तत्व हैं।

सहस्त्रार पर उस परम तत्व को अनुभव कर ही भव सागर तरता है, यह संदेश वसुदेव के यमुना को पार करने में निहित है।

जन्म के बाद कई भयानक राक्षकों का वध मानवीय वृत्तियों के मान मर्दन का पर्याय है, यहां कृष्ण इन्द्रियों के दमन की वकालत करते हुए योगी हैं।

इंद्र की पूजा का विरोध कर्मकांड का विरोध है, गोवर्धन की पूजा प्रकृति के संरक्षण का प्रत्यक्ष प्रयास है।

जब वे मथुरा भेजे जाने वाले दूध का विरोध कर ग्वाल बाल पर उसके अधिकार की बात करते हैं, तो वे गरीबी, कुपोषण के उन्मूलन और अन्याय का विरोध करने वाले समाज सुधारक हैं।

रास रचाते, मुरली बजाते कृष्ण स्थूल जीवन में ललित कलाओं के महत्व का प्रतिपादन करते हुए एक दक्ष कलाकार हैं, तो सूक्ष्म रूप में साधना में रत किसी प्राणी को होने वाले अनुभवों के रूप में इन दोनों कलाओं का वर्णन करते है।

गोपाल बनकर कृषि प्रधान धरा पर पशु धन के संरक्षण का संदेश देते हैं।

ब्रजमंडल से पलायन, जीवन में कर्म धर्म व आदर्शों की स्थापना को व्यक्तिगत सुख से ऊपर रखने का अद्भुद व सर्वकालिक प्रासंगिक प्रयास है।

कंस का वध अधर्म व अन्याय के विनाश हेतु संरक्षित बल के प्रयोग की आवश्यकता बताता है।

कुब्जा का उद्धार, सोलह हजार राजकुमारियों का उद्धार, द्रोपदी की रक्षा समाज में नारी अस्मिता को स्थापित करने का माध्यम है।

सुदामा से प्रेम मित्र भाव की पराकाष्ठा है तो शिशुपाल वध सहनशील होते हुए भी, अति होने पर बल प्रयोग व दंड विधान को अपनाने की अनिवार्यता दर्शाता है।

महाभारत का युद्ध धर्म और अधर्म के बीच सतत चलने वाले द्वंद्व का चित्रण है।
महाभारत जीवन के कटु यथार्थ का संग्रह है और मानवीय जीवन के इन कटु अनुभवों से कैसे सत्य व धर्म ( धारयेति इति धर्म:) की स्थापना की जाए, यही कृष्ण का शाश्वत संदेश है।

गीता के रूप में नीति और प्रबंधन के चमत्कारी सूत्र केवल किसी ईश्वरीय सत्ता के मुख से ही निःसृत हो सकते हैं, जिन्होंने गीता पढ़ी है, वे ही इस चमत्कार का अनुभव कर सकते हैं।

कृष्ण तत्व को, जगद्गुरु के स्वरूप को आत्मसात कर यदि हम अपने और अपने समाज के प्रबंधन के सूत्रों को समझ सकें, तो ही जन्माष्टमी पर्व को उत्सव के रूप में मनाने की सार्थकता है।

भगवान श्री कृष्ण की प्रतिज्ञा
श्री कृष्ण अवतार नहीं थे बल्कि अवतारी थे….जिसका अर्थ होता है “पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्” न ही उनका जन्म साधारण मनुष्य की तरह हुआ था और न ही उनकी मृत्यु हुयी थी।

सर्वान् धर्मान परित्यजम मामेकं शरणम् व्रज
अहम् त्वम् सर्व पापेभ्यो मोक्षस्यामी मा शुच–
( भगवद् गीता अध्याय 18 )

श्री कृष्ण: “सभी धर्मो का परित्याग करके एकमात्र मेरी शरण ग्रहण करो, मैं सभी पापो से तुम्हारा उद्धार कर दूंगा,डरो मत

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